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शख्सियत

*यादें*

बीते हुए लम्हों का एक चित्र सा दिखलाती हैं,
ये यादें भी कितनी अजीब है,ये सबको आती हैं।
ये सबको आती हैं।
कभी ख़ुशी बनकर आँखो में चमक लाती हैं,
तो कभी बेइंतहा चुभन बन दिल को तड़पाती हैं,
बिन चिंगारी के भी जैसे कोई आग सुलग जाती हैं....
ये यादें भी कितनी अजीब है ये सबको आती हैं!
ये सबको आती हैं।
कभी तनहाई में हमको खुद में डुबा जाती हैं,
कभी महफि़लों के शोर में हमको तन्हा कर जाती हैं,
गुजरे हुए पलों का एक कारवां सा ले आती हैं....
ये यादें भी कितनी अजीब हैं ये सबको आती हैं।
ये सबको आती हैं।
कभी गम बनकर खूब रूलाती,कभी अश्कों में मुस्काती हैं,
कहलाती है एक कहानी,या तस्वीर बन जाती हैं...
गुजऱे वक्त को रोक न पाते,बस यादें रह जाती हैं....
ये यादें भी कितनी अजीब हैं ये सबको आती हैैं।
ये सबको आती हैं...।
          राशी अग्रवाल
          गंज-(बिजनौर)

 

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