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महिला व युवाओं की प्रेरणा स्रोत है चित्रा सरवारा

अभिनव इंडिया/कुलभूषण शर्मा

अंबाला। अम्बाला छावनी की सशक्त और युवा आवाज चित्रा सरवारा एक लाजवाब डिजाइनर, संजीदा समाजसेवी व बा-कमाल लीडर हैं। वे उत्तरी हरियाणा, खास तौर पर अम्बाला इलाके में, किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपने पिता और पूर्व मंत्री निर्मल सिंह मोहड़ा की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ा रही चित्रा का समाजसेवा में भी कोई सानी नहीं है। संघर्ष की पगडंडी पर चलते हुए निरंतर अम्बाला की जनता के लिए काम कर रही हैं। हरियाणा की सबसे मेहनती, युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत और कर्मठ महिला नेता चित्रा सरवारा का आज 18 मार्च को जन्मदिन है। इस मौके पर चित्रा सरवारा के आवास पर शुभकामनाएं देने वाले समर्थकों का तांता लगा रहा।

चित्रा सरवारा आज यह नाम महिलाओं और युवाओं में किसी पहचान का मौहताज नहीं है, आज उत्तरी हरियाणा के युवा और महिलाएं चित्रा सरवारा को अपनी आवाज के रूप में देखते हैं। चित्रा सरवारा महिलाओं और युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत है, जिस तरह तमाम मुश्किलों के बाद भी चित्रा युवाओं के हक़ों के लिए एक बुलंद आवाज बनकर उभरी हैं या यह कहे कि समाज में हर वर्ग के लिए एक सशक्त आवाज है, जिस कारण लोगों का उनके साथ जुड़ाव व प्यार बढ़ता ही जा रहा है। अपने शुरूआती राजनीतिक करियर में ही अपनी मेहनत और मिलन सार होने के कारण चित्रा सरवारा उत्तरी हरियाणा के क्षेत्र में सबकी चहेती बनती जा रही हैं।

बचपन से ही चित्रा को घर में राजनीतिक माहौल मिला। उनके पिता निर्मल सिंह ने कभी भी बेटी और बेटों में फर्क नहीं किया। चित्रा की मानें तो उनके पिता का यही मानना रहा कि जिसको जो कॅरियर चुनना है वो आजाद है। यही वजह रही कि बेटों के समर्थन से निर्मल सिंह ने अपनी बेटी चित्रा को राजनीति में आगे किया। सबसे पहले चित्रा ने साल 2013 में राजनीति मे कदम रखते हुए अम्बाला नगर निगम का चुनाव लड़ा। खास पहलू यह है कि आजाद उम्मीदवार के रूप में ताल ठोकी और भारी मतों से विजेता बनने में कामयाब रही। चित्रा द्वारा अपने वार्ड में किए गए विकास कार्यों को आज भी वार्ड के निवासियों द्वारा याद किया जाता है। अम्बाला छावनी के नगर निगम में चुनाव जीतकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाली चित्रा आज उत्तरी हरियाणा की सभी विधानसभा सीटों पर अपना प्रभाव रखती हैं, खासकर के युवाओं और महिलाओं में अपनी पकड़ बना चुकी हैं। आज चित्रा सिर्फ अम्बाला की जनता के लिए ही नहीं उत्तरी हरियाणा और किसानों के हकों के लिए भी भरपूर प्रयास कर रही हैं।

चित्रा को बच्चों से एक खास लगाव है और महिलाओं और बच्चों से जुड़े जागरुकता और सशक्तता के कार्यक्रम भी वे करवाती रही हैं। महिलाओं की सेहत से जुड़ी कार्यशाला, बच्चों के बढ़ते शोषण के खिलाफ बात करना और जागरुकता के लिए मां-बेटी वर्कशॉप्स करवाना उनके लिए अहम रहा है। चाहे राजनीतिक हो या परिवार वे कभी भी अपने किसी भी फर्ज से पीछे नहीं हटी हैं। चित्रा का बेटा जब 6 माह का था और वह लिवर की समस्या से जूझ रहा था। तब चित्रा ने एक मां का फर्ज निभाते हुए अपने बेटे को बचाने के लिए अपना लिवर डोनेट किया। चित्रा और उनकी टीम के साथियों द्वारा समय समय पर विभिन्न रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाता रहा है। चित्रा आज जिस तरह आम जनता के दु:ख सुख में उनका साथ देती है, लोग उनकी इसी सादगी के कारण उनके साथ जुडऩा चाहते हैं। आज अम्बाला छावनी में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में केवल चित्रा सरवारा ही अपने साथियों के साथ अग्रणी हैं। आज चित्रा अपने साथियों की टीम के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर राजनीति में उत्तरी हरियाणा के मुद्दों को सत्ता पक्ष के समक्ष रख रही है। चित्रा सरवारा ने कोरोना काल में जरुरत मंदो की मदद करने के लिए काम किया। किसान विरोधी काले कानूनों के खिलाफ चित्रा सरवारा द्वारा किसानो की आवाज़ बुलंद की जाती रही हैं। किसान परिवार से होने के कारण चित्रा सरवारा किसानों के दर्द को बखूबी समझ सकीं। चित्रा ने ना सिर्फ अम्बाला में बल्कि कुंडली व टिकरी बार्डर पर जाकर भी किसान आंदोलन में अपने साथियों के साथ भाग लिया और किसान व किसानी की अवाज उठाई। जनता में किसान आंदोलन से जुड़े भ्रमों को दूर करने व किसान साथियों की मांगो के लिए चित्रा सरवारा द्वारा सोशल मीडिया पर भी आवाज बुलंद की गई। सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही नहीं चित्रा सरवारा को अपने नेता के रूप में चाहने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में भी मौजूद हैं। आज चित्रा सरवारा उत्तरी हरियाणा की राजनीति में जनता के मुद्दों को अपने दम पर अकेले उठाने का दम रखती हैं। चित्रा आए दिन सरकार द्वारा की जा रही ज्यादतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने के कारण सुर्खियों में रहती हैं। चित्रा हर मुद्दें पर सरकार के द्वारा की जा रही ना इंसाफी के समक्ष खड़ी है। अम्बाला में तो चित्रा सरवारा अपनी हिम्मत के लिए ही जानी जाती हैं क्योंकि सूबे के पूर्व गृह मंत्री और मौजूदा ऊर्जा मंत्री के सामने बिना किसी बड़े चुनाव चिन्ह के दो बार निर्दलीय चुनाव लड़ चुकी है और अपनी खुद की एक अलग पहचान बनाई। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता अनिल विज व उनके बीच कांटे का करीबी मुकाबला रहा। चित्रा सरवारा ने आज अपनी मेहनत और अपने मिलनसार व्यव्हार व सभी के दु:ख-सुख में साथ खड़े होने से लोगों के बीच अपनी एक अलग पहचान बना ली है।

चित्रा राजनैतिक ही नहीं अपितु सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों के कार्यक्रमों में अग्रणी रहकर कार्य करती है। आज हर जन के मुंह से यही सुनने को मिलता है कि चित्रा ने चुनाव हारा लेकिन सभी का दिल जीत लिया तभी आज किसी भी दल का कार्यकर्ता क्यों ना हों, चित्रा सरवारा को नेता के रूप में पसंद करता है। हरियाणा की युवा नेत्री, अम्बाला की बेटी भविष्य में एक कामयाब और अच्छी लीडर बनने जा रही है।

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