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धर्म-कर्म

तीर्थंकर भगवान महावीर ने सृष्टि को दी नई दिशा :रजत जैन

अभिनव इंडिया/अजय शर्मा
गुरुग्राम।
जैन समाज नगीना के पूर्व युवाध्यक्ष व सर्वजातीय सेवा समिति के उपाध्यक्ष रजत जैन ने कहा कि तीर्थंकर भगवान महावीर ने सृष्टि को नई दिशा दी और प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जियो और जीने दो का संदेश दिया। जैन समाज के युवाओं को संबोधित करते हुए रजत जैन ने बताया कि भगवान महावीर जैनधर्म के अंतिम 24 वें तीर्थंकर है। 2547,वर्ष पूर्व, ईसा पूर्व 527, पूर्व में निर्वाण (मोक्षपद) प्राप्त किया। जब सारी सृष्टि में हाहाकार मचा हुआ था। जनमानस अपने आचरण से पथ भ्रष्ट व विमुख होकर अमर्यादित व अनैतिक कार्यो में अधिक सम्मिलित होने लगा तो इन सब से मुक्ति दिलाने के लिए ईसा से 599,वर्ष पूर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की शुभ तिथि त्रयोदशी को कुण्डलपुर के राजा  सिद्धार्थ व रानी त्रिशाला के घर वर्धमान नामक बालक का जन्म हुआ। जब समस्त सृष्टि घोर अंधकार व निराशा के गहरे सागर में डूबी हुई थी, तो वर्धमान ने जनमानस में नवचेतना, उमंग, उत्साह, उल्लास(आमोद) व नवऊर्जा का संचार किया। वर्धमान ने जैनधर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो: धर्म के पथ पर चलकर प्राणी मात्र को जियो और जीने दो का अमर संदेश दिया। जनमानस को अहिंसा का मार्ग प्रशस्त कर अंधकार व निराशा के गहरे सागर से बाहर निकालकर नैतिक सुगम, सुपथ पर लाने का कार्य किया। उन्होंने जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य(अस्तेय) और ब्रह्मचर्य बताए। वहीं छुआछूत, ऊँचनीच, वैरभाव, भेदभाव के अन्याय को समाप्त करने के लिए कहा कि व्यक्ति जन्म से नहीं, कर्म से श्रेष्ठ है। 30वर्ष की आयु में राजशाही, ठाटबाट, धन, वैभव त्यागकर, तपस्वी जीवन धारणकर वैराग्य ले लिया। बाद में यहीं वर्धमान तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी कहलाए और 24वें तीर्थंकर बने। 72 वर्ष की आयु में बिहार राज्य के पावापुरी नामक स्थान पर 2547, वर्ष पूर्व, ईसा पूर्व 527 पूर्व में शुभ तिथि  कृष्णामवस्या को निर्वाण अर्थात मोक्ष पद प्राप्त किया। 2547,वर्ष पूर्व मोक्ष प्राप्त कर सृष्टि को एक नई दिशा प्रदान की। बारह साल, पांच महीने, पंद्रह दिन, कठोर तप करने के पश्चात, वैसाख शुक्ल दशमी को मगध के जृम्भक गांव में केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। दुनिया को अहिंसा परमो धर्म का ज्ञान बांट कर, जियो और जीने दो, का अमर संदेश दिया। रजत जैन ने बताया की भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत, प्रत्येक आत्मा के लिए एक समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक ही हैं। हम दूसरों के प्रति भी वही विचार रखें, जो स्वयं को पसंद हो। यही भगवान महावीर का जियो और जीने दो, का सिद्धांत है तथा प्राणी मात्र के आत्म कल्याण का मार्ग है।
 

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