भारत में गर्भवती महिलाओं पर बढ़ता गर्मी का संकट
-अध्ययन में जन्म संबंधी जटिलताओं का बढ़ा खतरा
नई दिल्ली। भारत में बढ़ती भीषण गर्मी गर्भवती महिलाओं और उनके होने वाले बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। एक नए राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन में सामने आया है कि गर्भावस्था के दौरान लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहने से कम वजन वाले शिशु के जन्म, समय से पहले प्रसव और मृत शिशु जन्म (स्टिलबर्थ) जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है। अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान गर्मी का प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह गर्भावस्था के किस चरण में पड़ी है।
यह अध्ययन भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों पर आधारित है, जिसमें वर्ष 2015 से 2020 के बीच देश के 707 जिलों में दर्ज 2,09,266 जन्मों का विश्लेषण किया गया। शोध का शीर्षक "भारत में प्रतिकूल गर्भावस्था परिणामों पर भीषण गर्मी के तनाव का प्रभाव" है। अध्ययन में प्रत्येक जन्म को गर्भावस्था के दौरान संबंधित क्षेत्र की स्थानीय गर्मी की परिस्थितियों से जोड़ा गया।
अध्ययन का नेतृत्व यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड-आईआईटी दिल्ली एकेडमी ऑफ रिसर्च (यूक्यूआईडीएआर) के शोधकर्ताओं ने किया है। इसमें आईआईटी दिल्ली, यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स, यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर और कोरिया यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने सहयोग किया है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्भावस्था के दौरान लगातार पडऩे वाले अत्यधिक गर्म दिनों का सीधा संबंध प्रतिकूल प्रसव परिणामों से है। इसके लिए भारत ताप सूचकांक (इंडिया हीट इंडेक्स) का उपयोग किया गया, जिसमें तापमान, आर्द्रता, हवा और धूप जैसे कारकों को शामिल किया गया। लगातार तीन या उससे अधिक अत्यधिक गर्म दिनों को एक 'हीट इवेंट' माना गया।
अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान प्रत्येक अतिरिक्त अत्यधिक गर्म दिन के साथ कम वजन वाले शिशु के जन्म का जोखिम लगभग एक प्रतिशत तक बढ़ जाता है। कुल जन्मों में लगभग 12.8 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले पाए गए, जबकि करीब एक प्रतिशत बच्चों का जन्म समय से पहले हुआ और 0.74 प्रतिशत मामलों में मृत शिशु जन्म दर्ज किया गया।
गर्भावस्था की अलग-अलग तिमाहियों में गर्मी का प्रभाव भी अलग पाया गया। पहली तिमाही में अत्यधिक गर्मी का संबंध समय से पहले प्रसव से मिला, दूसरी तिमाही में कम वजन वाले बच्चों के जन्म का खतरा बढ़ा और तीसरी तिमाही में मृत शिशु जन्म का जोखिम अधिक पाया गया। अध्ययन में यह भी सामने आया कि अत्यधिक गर्मी का प्रभाव सभी महिलाओं पर समान रूप से नहीं पड़ता। कम बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) वाली, गरीब, कम शिक्षित और कुपोषित महिलाओं में इसका खतरा अधिक पाया गया। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली गर्भवती महिलाएं भी अत्यधिक गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील पाई गईं।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान शरीर पर पहले से अतिरिक्त शारीरिक दबाव होता है। अत्यधिक गर्मी और शरीर में पानी की कमी से गर्भाशय तक रक्त प्रवाह प्रभावित हो सकता है, जिससे भ्रूण के विकास पर नकारात्मक असर पडऩे की आशंका बढ़ जाती है।
शोधकर्ताओं ने सरकार से अपील की है कि देश के हीट एक्शन प्लान में गर्भवती महिलाओं को प्राथमिकता दी जाए। उन्हें पर्याप्त पानी, ठंडी और सुरक्षित जगह, नियमित स्वास्थ्य जांच तथा गर्मी से बचाव संबंधी परामर्श उपलब्ध कराया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हीटवेव को देखते हुए गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना समय की आवश्यकता है।
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