ग्रीन एनर्जी से सेकेंडरी स्टील उद्योग को बड़ी राहत
-बिजली खर्च में 34% तक कटौती संभव
नई दिल्ली। सेकेंडरी स्टील क्षेत्र की सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम (MSME) इकाइयों की बिजली लागत नवीकरणीय ऊर्जा के सामूहिक उपयोग से 34 प्रतिशत तक कम हो सकती है। रायपुर में बुधवार को कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) के ग्रीन स्टील समिट में जारी एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रुप कैप्टिव मॉडल अपनाने पर इकाइयों को उनके आकार के अनुसार सालाना 2.2 करोड़ से 2.4 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है, जबकि शुरुआती निवेश एक से दो वर्ष में ही वसूल हो जाएगा।रिपोर्ट में बताया गया है कि बिजली सेकेंडरी स्टील इकाइयों की कुल परिचालन लागत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा होती है। वर्तमान में कई राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा की कीमत 4.5 से 6 रुपये प्रति यूनिट है, जबकि ग्रिड बिजली की दर 7 से 8 रुपये प्रति यूनिट तक है। यही अंतर उद्योगों के लिए लागत घटाने का बड़ा अवसर बन सकता है।अध्ययन में देश के 22 सेकेंडरी स्टील क्लस्टरों का आकलन किया गया। रायपुर, बेलगाम, शिमोगा, राजकोट और भावनगर को नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की दृष्टि से सबसे अधिक संभावनाशील क्लस्टर माना गया है। इनमें रायपुर और राजकोट का विस्तृत विश्लेषण किया गया, जिसमें निवेश, लागत और संभावित बचत का आकलन शामिल है।रिपोर्ट के अनुसार, ग्रुप कैप्टिव मॉडल में कई स्टील इकाइयाँ मिलकर नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित करती हैं और अपनी हिस्सेदारी के अनुसार बिजली प्राप्त करती हैं। इससे निवेश का बोझ कम होता है और परियोजना आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य बनती है।रिपोर्ट में कहा गया है कि राजकोट में 5 मेगावाट हिस्सेदारी लेने वाली एक फाउंड्री को करीब 1.4 करोड़ रुपये निवेश करने होंगे, जिससे उसकी बिजली लागत लगभग 20 प्रतिशत कम हो सकती है। वहीं रायपुर में 10 मेगावाट हिस्सेदारी लेने वाली इकाई को लगभग 2.7 करोड़ रुपये निवेश करने होंगे और उसकी बिजली लागत करीब 34 प्रतिशत तक घट सकती है।सीआईआई पूर्वी क्षेत्र की स्टील उपसमिति के अध्यक्ष एवं गोदावरी पावर एंड इस्पात लिमिटेड के प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा, "रायपुर जैसे क्लस्टरों में सालाना 2.4 करोड़ रुपये तक की बचत उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कम मार्जिन वाले इस क्षेत्र में निवेश दो वर्षों के भीतर वसूल हो जाता है। हालांकि, ओपन एक्सेस को लेकर नियामकीय स्पष्टता मिलने पर अधिक इकाइयाँ इस मॉडल को अपनाने के लिए आगे आएंगी।"जेएमके रिसर्च एंड एनालिटिक्स के वरिष्ठ सलाहकार प्रभाकर शर्मा ने कहा, "ग्रुप कैप्टिव मॉडल MSMEs के लिए नवीकरणीय ऊर्जा हासिल करने का तरीका बदल सकता है। मांग को एकत्रित करने से परियोजनाएँ वित्तीय रूप से अधिक व्यवहार्य बनती हैं और निवेश का जोखिम कई इकाइयों में बंट जाता है।"WWF-भारत के निदेशक (सतत व्यवसाय) विशाल देव ने कहा, "सेकेंडरी स्टील क्षेत्र के लिए नवीकरणीय ऊर्जा केवल उत्सर्जन घटाने का माध्यम नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की रणनीति भी है। समूह आधारित खरीद मॉडल उद्योगों की लागत और कार्बन उत्सर्जन दोनों कम करने में मदद करेगा।"क्लाइमेट कैटलिस्ट की सह-कार्यकारी CEO एवं भारत निदेशक साक्षी बालानी ने कहा, "MSME सेकेंडरी स्टील उत्पादन की रीढ़ हैं। नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन लागत और उत्सर्जन दोनों को एक साथ कम करती है। ऐसे मॉडल छोटे उद्योगों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद करेंगे।"
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