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स्वच्छता पखवाड़े के तहत दी जल संग्रहण की जानकारी

अभिनव इंडिया/तेजवंत शर्मा
मण्डकौला/पलवल।
 चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के अंर्तगत कृषि विज्ञान केन्द्र, मण्डकौला  द्वारा 1 से 15 सितम्बर  तक  मनाये  जा रहे स्वच्छता पखवाड़े के तहत जलशक्ति गांव खोखियाका  में जल संग्रहण जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें 49 महिलाओं, छात्र-छात्राओं  व  कृषकों  ने भाग  लिया।  कार्यक्रम  के  दौरान केन्द्र की वरिष्ठ संयोजक एंव  प्रमुख  विस्तार  विशेषज्ञ (गृह विज्ञान) डा. सुमित्रा  यादव  ने  कार्यक्रम  के  उद्देश्यों  की जानकारी देते हुए कहा  कि  जल  ही  जीवन  है  और  इसकी  एक-एक बूंद को बचाना व संग्रहित करना सभी नागरिकों  की  सर्वोपरि  जिम्मेदारियों  में  से एक है। उन्होंने कहा कि कृषि सहित जीवन के प्रत्येक पहलू  में पानी  की  जहां भी बर्बादी अथवा जरुरत से अधिक प्रयोग होता है, उसे रोकने के सभी उपाय करते हुए जल संसाधनों को भविष्य के लिए बचाकर रखना हैं। डा. सुमित्रा ने महिलाओं व बच्चों  को  घरेलु  स्तर  पर  पानी के विभिन्न उपयोग के दौरान इसकी बचत करने के अनेक व्यवहारिक  नुस्खे सुझाए।  उन्होंने  संतुलित पोषाहार की जानकारी देते हुए कहा कि महिलाओं व बच्चों  को  फल  व  सब्जियां,  अंकुरित दाल और मिले जुले अनाज की रोटी देनी चाहिए। इस सन्दर्भ में उन्होंने शीत ऋ तु में बाजरे के बतौर अनाज व अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे बाजरे  के लड्डू, बिस्कुट  आदि  के अधिकाधिक प्रयोग पर बल दिया और कहा कि मोटा पीसा आटा बिना छाने प्रयोग करना चाहिए। इस अवसर पर मुख्य विस्तार विशेषज्ञ (बागवानी) डा. रणबीर सिंह सैनी ने कृषकों के अमल हेतु बागवानी फसलोंत्पादन में जल संग्रहण व बचत की समग्र जानकारी देते हुए कहा  कि  बागों  में इन-सीटू (उसी स्थान पर/पौधे के जड़ क्षेत्र में) वर्षा जल संग्रहण हेतु पौधे की छतरी के नीचे पौधे के मुख्य तने की ओर पांच से दस प्रतिशत ढ़लान वर्षा ऋ तु से पहले बना देनी चाहिए।  एेसा  करने से  बाद में सिंचाईयों की कम जरुरत पडेगी। यह विधि उन्होंने बागवानों को अमरुद  के  बाग में प्रदर्शित भी की। उन्होंने कहा कि अन्य फसलों में वर्षा जल का संग्रहण कर सिंचाई  में प्रयोग  हेतु उपलब्ध भूमि के ढ़लान वाले भाग में कच्चा तालाब खोदकर उसमें पानी संग्रहण  करना  चाहिए।  इसके अतिरिक्त किसानों को चाहिए कि वे अधिकाधिक टपका-टपका, सूक्ष्म  फौहारा  बागवानी  फसलों  के  लिए  व  फौहारा सिंचाई परम्परागत फसलों के लिए अपनाए जो 30 से लेकर  70 प्रतिशत  तक  सिंचाई  जल  की बचत करने में सक्षम होने के साथ-साथ उत्पादन व गुणवत्ता में भी वृद्धि करती है और किसानों को खरपतवारों की समस्या का कम से कम सामना  करना पड़ता हैं। केन्द्र के सस्य वैज्ञानिक डा. विनोद कुमार ने फसलों में जल किफायत के लिए  कम  पानी में अधिक  उत्पादन  देने वाली फसलों व किस्मों के चुनाव, गहरी जड़ों वाली फसलों  के  चुनाव,  मिट्टी  में अधिक  अवधि तक नमी बनी रहने के लिए ज्यादा से ज्यादा देशी खादों के प्रयोग, फसल अवशेषों को जमीन में ही गलाने आदि को अपनाने का आहवान किया। उन्होंने कहा कि रेतीले व शुष्क क्षेत्रों में स्प्रिंकलर सिंचाई को अधिकाधिक बढ़ावा दें और धान की खेती को एेसे क्षेत्रों में निरुत्साहित करें जहां सिंचाई जल की कमी हो और हल्की मिट्टी हो। 
 

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